Friday, December 1, 2017

भारत में एक नया अपराध व अपराध बोध  

भारत में एक नया अपराध व अपराध बोध

न दिनों पिछले कुछ महीनो से देश में एक नया अपराध प्रारम्भ हुआ है. यही नहीं आम जनता में एक नया अपराध बोध भी शुरू हो चुका है. यह अपराध बनता है घर के बाहर तथा आम नागरिक तब तक अपराध ग्रस्त रहता है, जब तक वह सकुशल घर नहीं पहुच जाए. यही नहीं, भारतीय अपराध क़ानून के अनुसार भी यह कोई विधिवत अपराध नहीं है लेकिन हालात व परिस्थितयो ने कइयो को अपराधी या कम से कम अपराधग्रस्त तो बना ही दिया.

ह अपराध है, जेब में या आपके वाहन में रू. 500-2000 के नोट रखना. पहले से ही सिर्फ नकली नोट रखना तो घोषित अपराध है लेकिन अब तो असली व आपके हक़-अधिकार के  रू. 500-2000 के नोट रखना भी अघोषित अपराध है. आजकल, पुलिस जब चाहे किसी व्यक्ति की बस-ट्रेन में तलाशी ले लेती है. और यदि आपके पास रू. 500-2000 के कुछ हजार नोट भी मिल गए, तो समझो आप अपराधी बन गए. पुलिस आपको संदेह के नाम पर एक बार तो आपको अपराधी होने का अपराध बोध करवा ही देगी.

स अपराध को समझने के लिए एक सच्ची कहानी लिखी जा रही है. एक राजस्थानी चेन्नई में रहता है तथा राजस्थान में भी अपना मकान मेन्टेन करता है. नोट बंदी से पहले, उसने राजस्थान में अपने मकान में कुछ निर्माण चालु करवा  रखा था लेकिन मजदूरो को मजदूरी का भुगतान रोकड़ में ही चाहिए थी. भुगतान रोकड़ में संभव नहीं होने के कारण मकान का निर्माण कार्य बंद हो गया. एक दिन बड़ी हिम्मत जुटाकर 2.00  लाख रू. लेकर चेन्नई से राजस्थान जाने के लिए प्लान बनाया. खुद के एक नंबर के रू. 2.00 लाख ने नए नोट को ले जाने की कल्पना से ही वह अपराधग्रस्त हो गया और किसी पुलिस वालो को शंका नहीं हो उसके लिए उसने अपनी पत्नी व बेटी को भी साथ में लिया. और उन रू. 2.00 लाख को तीनो ने आपस में बांटकर अलग-अलग जगह छिपा कर रख लिए.

वो राजस्थानी सकुशल राजस्थान पहुच गया लेकिन पूरे रास्ते, उसका पूरा परिवार अपराध बोध से इतना ग्रस्त था मानो उसके पास रू. 2.00 लाख के नोट नहीं बल्कि रू. 2.00 लाख  की अफीम हो. पूरे रास्ते ट्रेन में कितनी बार पुलिस आई तथा कई लोगो के सामान की तलाशी ली गयी लेकिन उसकी फॅमिली को देख कर हर बार वह तलाशी से बचता रहा. रू. 2.00 लाख के नए नोट को अपने पास में रखने का गुनाहगार बार-बार बचता रहा और अपने आपको भाग्यशाली समझता रहा. जिसके पास भी कुछ नए नोट मिलते, पुलिस उस ‘अमीर बेईमान’  को साइड में ले जाती और कुछ भेट पूजा के बाद, उसको बरी कर देती. आप कल्पना कर सकते है, ऐसे कितने ‘अमीर बेईमान’ अपराधी उस ट्रेन में सफ़र कर रहे थे, कितने लोगो को कुछ समय के लिए पुलिस ने अपराधी माना तथा कौन अपराध बोध से ग्रस्त नहीं रहा उस सफ़र में.

आजकल तो चलती कार को रूकवाकर गाडी के कागजात  नहीं माँगते बल्कि सब से पहले रू. 500-2000 के नोटो के लिए सब यात्रियों व सामान की तलाशी ली जाती है.  कुछ 500-2000 के नोट मिल गए, तब तो आप हाथो-हाथ अपराधी बन जायेंगे. नहीं तो फिर गाडी के कागजातों के बारे में पूछा जाता है.

इस तरह से आयकर विभाग तो शायद आपको कभी नहीं पूछेगा लेकिन पुलिस की पूछताछ तत्काल प्रारम्भ. आप एक बार तो पक्के अपराधी. पता नहीं कब आजादी बहाल होगी सरकारी पुलिस की तलाशी की ताकत से जो हर किसी को एक बार तो अपराध बोध से ग्रस्त कर ही देती है, वो भी उस अपराध के लिए जो किया ही नहीं गया.

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