कल्पना कीजिए कि आपके बगीचे में उगा एक साधारण फूल आपकी छत पर बिजली पैदा कर रहा हो। यही अजीबोगरीब लेकिन वास्तविक खबर रांची, झारखंड से आ रही है। जहां Central University of Jharkhand (CUJ) के वैज्ञानिकों ने 'संध्या मालती' फूल की पंखुड़ियों से निकाले गए प्राकृतिक रंग का उपयोग करके एक नया प्रकार का सौर सेल विकसित किया है। यह तकनीक न केवल कम लागत वाली है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित है।
21 मई 2026 को प्रकाशित इस रिपोर्ट ने हरित ऊर्जा के क्षेत्र में एक नई दिशा तय की है। जबकि पारंपरिक सौर पैनलों में महंगी धातुओं और विषैले रासायनिक पदार्थों का उपयोग होता है, CUJ की टीम ने प्रकृति से ही समाधान ढूंढा है। इस खोज का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह सामग्री देश भर में आसानी से उपलब्ध है, जिससे इसे व्यापक स्तर पर लागू करना संभव हो सकता है।
फूल से बिजली: तकनीक कैसे काम करती है?
यह कोई जादू नहीं, बल्कि 'डाई-सेंसिटाइज्ड सोलर सेल' (DSSC) तकनीक है, जिसे अक्सर 'ग्रेट्ज़ेल सेल' भी कहा जाता है। डॉ. बसुदेव प्रधान, ऊर्जा इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ता of Central University of Jharkhand ने बताया कि उन्होंने संध्या मालती (Mirabilis Jalapa) की पंखुड़ियों से प्राकृतिक रंग निष्कर्षित किया। इस रंग को सौर सेल में 'सेंसिटाइजर' के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
सरल शब्दों में, यह प्राकृतिक रंग सूर्य की रोशनी को सोखता है और इलेक्ट्रॉनों को उत्तेजित करता है, जिससे विद्युत धारा प्रवाहित होती है। डॉ. प्रधान के अनुसार, "फूल से निकाले गए प्राकृतिक रंग का उपयोग सौर सेल में 'सेंसिटाइजर' के रूप में किया गया, जो सूर्य की रोशनी को अवशोषित कर इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह को सक्रिय करता है, जिससे बिजली उत्पन्न होती है।"
परिणाम और भविष्य की क्षमता
अभी शोध अपने प्रारंभिक चरण में है, लेकिन परिणाम काफी प्रभावशाली हैं। अब तक किए गए परीक्षणों में वैज्ञानिकों को 0.61 प्रतिशत की अधिकतम पावर कन्वर्जन एफिशिएंसी (PCE) प्राप्त हुई है। साथ ही, यह सेल लगभग 250 घंटों तक स्थिर रहने में सक्षम रहा। हालांकि यह संख्या पारंपरिक सिलिकॉन सौर पैनलों की तुलना में कम लग सकती है, लेकिन प्राकृतिक डाई आधारित तकनीकों के लिए इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
और यहीं पर बात रोचक बनती है। शोध टीम ने क्वांटम रासायनिक गणनाओं के माध्यम से यह अनुमान लगाया है कि संध्या मालती के छह मुख्य डाई घटकों में से प्रत्येक की सैद्धांतिक क्षमता 13.9% से 20.8% तक दक्षता देने की है। इसका मतलब है कि यदि तकनीक को और परिष्कृत किया जाए, तो यह भविष्य में बहुत अधिक कुशल हो सकती है।
पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा पर असर
इस खोज का एक और महत्वपूर्ण पहलू इसकी सुरक्षा है। पारंपरिक सिंथेटिक या धातु-आधारित डाई अक्सर विषैली होती हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। इसके विपरीत, संध्या मालती से प्राप्त प्राकृतिक डाई पूरी तरह से गैर-विषैली, जैव-अपघटनीय (biodegradable) और बेहद सस्ती है।
डॉ. प्रधान ने स्पष्ट किया कि यह प्राकृतिक रंग किसी गैर-खाद्य स्रोत से प्राप्त होता है, इसलिए इसका खाद्य सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ता। चूंकि संध्या मालती (जिसे Four O' Clock Flower, गुल-अब्बास या गुल-बख्शी भी कहा जाता है) झारखंड सहित देश भर में आसानी से पाई जाती है, इसलिए कच्चे माल की आपूर्ति में कोई समस्या नहीं आएगी। यह पौधा स्थानीय स्तर पर आसानी से उगाया जा सकता है, जिससे उत्पादन लागत और भी कम होगी।
विशेषज्ञों की राय और आगे का रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित तकनीकों को बड़े स्तर पर विकसित किया जाए, तो भविष्य में सस्ती, सुरक्षित और ईको-फ्रेंडली सौर ऊर्जा आम लोगों तक आसानी से पहुंचाई जा सकती है। यह जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
हालांकि, अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं। 0.61% की वर्तमान दक्षता को व्यावसायिक स्तर पर स्पर्शयोग्य बनाने के लिए और शोध की आवश्यकता है। लेकिन यह शुरुआत इस बात का सबूत है कि प्रकृति हमारे पास ऐसे समाधान रखती है जिन्हें हमने अनदेखा कर दिया था।
Frequently Asked Questions
संध्या मालती से बने सौर सेल की वर्तमान दक्षता क्या है?
वर्तमान परीक्षणों में इस सौर सेल की अधिकतम पावर कन्वर्जन एफिशिएंसी (PCE) 0.61 प्रतिशत पाई गई है। हालांकि, क्वांटम रासायनिक गणनाओं के अनुसार, इसकी सैद्धांतिक क्षमता 13.9% से 20.8% तक पहुंच सकती है।
क्या यह तकनीक पर्यावरण के लिए सुरक्षित है?
हाँ, यह तकनीक पूरी तरह से सुरक्षित है। संध्या मालती से निकाला गया प्राकृतिक रंग गैर-विषैली और जैव-अपघटनीय है। इसमें कोई हानिकारक धातु या रासायनिक पदार्थ नहीं होता, जो पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में मदद करता है।
किस फूल का उपयोग इस शोध में किया गया है?
इस शोध में 'संध्या मालती' (Mirabilis Jalapa) फूल का उपयोग किया गया है, जिसे अंग्रेजी में Four O' Clock Flower और हिंदी/उर्दू में गुल-अब्बास या गुल-बख्शी भी कहा जाता है। यह पौधा भारत भर में आसानी से उपलब्ध है।
क्या इसका उपयोग खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है?
नहीं, इसका खाद्य सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ता। डॉ. बसुदेव प्रधान ने स्पष्ट किया है कि यह प्राकृतिक रंग गैर-खाद्य स्रोत से प्राप्त होता है, इसलिए इसका उपयोग करने से खाद्य श्रृंखला या मानव स्वास्थ्य पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।
इस तकनीक को व्यावसायिक रूप से लागू करने में कितना समय लगेगा?
अभी शोध प्रारंभिक चरण में है। विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षता को बढ़ाने और स्थिरता को सुनिश्चित करने के लिए और शोध की आवश्यकता है। एक निश्चित समयरेखा अभी घोषित नहीं की गई है, लेकिन यह भविष्य में सस्ती सौर ऊर्जा का स्रोत बन सकता है।