Tuesday, June 27, 2017

पदार्थ की अवस्थाएं तीन नहीं बल्कि पाँच होती हैं – भारतीय पुरातन ज्ञान (भाग-7) 

पदार्थ की अवस्थाएं तीन नहीं बल्कि पाँच होती हैं। भारतीय पुरातन ज्ञान (भाग-7)

जब कोई तारा याँ उल्कापिंड आसमान से गिरता हुआ दिखता हैं तो उसके पीछे बनने वाली चमकीली रेखा उसके विनाश की रेखा होती हैं। तीव्र गति से जो वस्तु वायु तत्व से घर्षण करती हैं तो उससे स्वतः तेज तत्व उत्पन्न होने लगता हैं और वस्तु अपने मूल रूप को प्राप्त करने लगती हैं। वह विनष्ट होकर आकाश तत्व  में विलीन हो जाती हैं। यही कारण हैं कि हमारी धरती की ओर गिरने वाले अधिकांश ब्रह्माण्डीय पिंड धरती पर घिरने से पूर्व ही पूर्णतया नष्ट हो जाते हैं। यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इस ब्रह्माण्ड में कोई भी चीज नष्ट नहीं होती हैं बल्कि रूपांतरण होता हैं। इसे रूप परिवर्तन कह सकते हैँ।

लोग पहले दो पत्थरो को आपस में टकराकर याँ घर्षण द्वारा आग पैदा करते थे। ये विशेष प्रकार के पत्थर थे जो संयोग से किसी व्यक्ति को मिले और आग पैदा करने का ज्ञान मानव जाति को हुआ। उन पत्थरों को चकमक पत्थर कहा जाता था जिन्हें आपस में टकराने से चिंगारी निकलती थी। यह पत्थर आज भी हैं और कई लोग आज भी इनका उपयोग करते हैं लेकिन अब दो पत्थरों की जगह एक पत्थर का उपयोग होता हैं व बीच मेँ रुई का कच्चा धागा रखकर दूसरे हाथ में एक लोहे की कड़ी जैसे औजार से पत्थर के साथ घर्षण किया जाता है जिससे निकली चिंगारी से बीच में रखा रुई का कच्चा धागा तुरन्त प्रज्वलित हो जाता हैं। आज भी जंगलो में रहने वाले भेड़ पालक इसका उपयोग करते हुए मिल जायेंगें।

पहले आज की तरह कपूर को माचिस से जलाकर यज्ञ की अग्नि प्रज्ज्वलित नहीं की जाती थी बल्कि एक विशेष लकड़ी से बने यन्त्र, जिसे अरणि कहते हैं, के द्वारा उस लकड़ी का आपस में घर्षण कर आग प्रज्वलित की जाती थी। जब तक इस तरीके से स्वतः आग प्रज्वलित नहीं होती थी, तब तक यज्ञ की शुरुआत नहीं होती थी।

जहाँ बांस की खेती होती हैं वहाँ के लोगो को यह जानकारी हैं कि कई बार तेज हवा चलने पर बांस आपस में टकराने लगते हैं और उस घर्षण से बांस के खेतो में आग लग जाती हैं। हम अपनी दोनों हथेलियों को आपस में मिलाकर एक दूसरे से रगड़ते हैं तो उनमे ऊष्मा बनने लगती हैं। उन हथेलियों को यदि हम अपने चेहरे पर लगायेंगें तो हमें गर्मी का अहसास होगा।

यह आकाश व वायु तत्व की उपस्थिति में तेज तत्व के पैदा होने के कुछ उदाहरण हैं, प्रमाण हैं जो रोजमर्रा के जीवन में देखने को मिल जाते हैं।अभी विज्ञान सीधे तौर पर आकाश व वायु तत्वों से तेज तत्व  को पाना तो दूर, केवल मात्र ऊर्जा को ही सीधे प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाया हैं। इसी से अंदाज लगाया जा सकता हैं कि विज्ञान अभी प्रकृति के रहस्यों को समझने में कितना पीछे है। अगर हमारे पास संरक्षित पुरातन ज्ञान को आज हमारा विज्ञान अपना आधार बनाए तो उनकी खोजो को एक नई दिशा मिल सकती हैं।

शेष अगली कड़ी में……………… लेखक व शोधकर्ता : शिव रतन मुंदड़ा 

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