Thursday, March 7, 2019

जीएसटी की तकनीकी कमियों से त्रस्त देश के कई व्यापारी सदमे में ?  

 जीएसटी की तकनीकी कमियों से त्रस्त देश के कई व्यापारी सदमे में ?

आंदोलनरत सूरत के कपड़ा व्यापारी

व्यापारियों को शायद अभी तक समझ में आ चुका होगा कि वो मोदी सरकार के लिए व्यापारी कोई राजनीतिक फायदेमंद ग्रुप नहीं है, अत: मोदी सरकार उनकी कुछ भी सुनने वाली नहीं है. मोदी सरकार का एक ही लक्ष्य है कि जीएसटी को कमियों के बावजूद भी लागू किया जाए तथा  नोटबंदी के समय जारी किये गए सेकड़ो आदेशो के जेसे ही तकनीकी कमियों को दूर करने के प्रयास किये जाते रहेंगे. 

यदि कमिया दूर नहीं भी होती है तो व्यापारी जाएगा कहां ? यदि उसे भारत में व्यापार करना है तो इन्तजार करेगा.  इस लेख में कुछ कमियों को ही यही नीचे लिस्ट आउट किया जा रहा है, यदि पाठको के पास भी यदि कोई बात / तकलीफ हो तो,  देश की जनता को बताने के लिए,  तो आप भी नीचे कमेंट लिख सकते है, जिनका समावेश अगले लेखो में  किया जा सकेगा – 

1.  जीएसटी की एक-मुश्त रेट लिस्ट कही भी उपलब्ध नहीं – बड़े ही आश्चर्य की बात है कि 6 दिन के बाद भी जीएसटी की एक-मुश्त रेट सरकारी लिस्ट कही भी उपलब्ध नहीं है. ऐसे में कोई व्यापार केसे कर सकता है. इस मामले में व्यापारी पूरी तरह व्हात्सप्प, facebook, मार्किट चर्चाओं व स्वम्भू सलाहकारों व कानूनविदों या सरकारी विज्ञापनों के भरोसे यानिकी भगवान भरोसे चल रहा है. कुछ आधी-अधूरी लिस्ट उपलब्ध है  लेकिन वह लिस्ट अंतिम है इसके कोई कही गारंटी या निश्चिंतता नहीं है. 

 2. जीएसटी का रजिस्ट्रेशन ही नहीं मिल रहा है – इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी गडबडी तो यह है कि अभी भी लाखो व्यापारियों को रजिस्ट्रेशन ही नहीं मिल पा रहा है.

 (क) कंपनियों व एलएलपी के रजिस्ट्रेशन के लिए डिजिटल सिग्नेचर अनिवार्य है. रजिस्ट्रेशन के लिए इच्छुक कंपनियों व एलएलपी के पास डिजिटल सिग्नेचर  (डीएससी) भी है लेकिन जीएसटी की वेबसाइट की किसी तकनीकी कमी के कारण डिजिटल सिग्नेचर  (डीएससी)  होने के बावजूद नए रजिस्ट्रेशन नहीं हो रहे है.

 (ख) दूसरा, आधार में मोबाइल नंबर रजिस्टर्ड नहीं होने के कारण भी रजिस्ट्रेशन नहीं हो रहे है. सरकार ने आधार में मोबाइल नंबर रजिस्टर करने / करवाने के लगभग सारे रास्ते भी बंद कर दिए है.  अत:  इस कमी को दूर करने तक के समय को व्यापारी आराम करने या तीर्थ यात्रा में सदुपयोग कर सकता है.

 3. जीएसटी इनवॉइस (बिल) में अन्य आइटम पर टैक्स रेट क्या होगी – यदि कोई व्यापारी अपने इनवॉइस में वस्तु की कीमत के साथ-साथ अन्य खर्च जेसे- लोडिंग चार्ज, पैकिंग चार्ज, पोस्टेज, पैकिंग मटेरियल, लेबर चार्ज आदि चार्ज करता है तो ऐसे अन्य खर्च पर टैक्स रेट क्या होगी. क़ानून इस मामले में चुप है, व्यापारी अब किसे पूछे और किस पर विश्वास करे.

 

4. जीएसटी के तहत उपकर (Sub-tax) आर सी एम् / रिवर्स टैक्स – क़ानून की शुरूआत में तो 20/- की चाय की खरीदी पर ही रिवर्स टैक्स लगा दिया गया था लेकिन चर्चा व विवाद बढ़ने पर सरकार ने यह लिमिट बढ़ा कर प्रतिदिन रू. 5,000/- की खर्चे की कर दी यानिकी प्रतिदिन अपंजीकृत व्यवसायियों से रू. 5,000/- तक के खर्चो / खरीदी पर रिवर्स टैक्स नहीं लगेगा. लेकिन माहवारी खर्चो (Monthly) व वार्षिक खर्चो (AMC) होगा. कुल मिलाकर आर सी एम् / रिवर्स टैक्स  एक अबूझ पहेली बनी हुई है.

 5. जीएसटी का एम्.आर.पी. पर असर –  सरकारी बुद्धि जीवियो ने इस समस्या की भी कल्पना ही नहीं की और अब समाधान के लिए कुछ भी आदेश जारी कर रहे है. इस बाहुबली सरकार के अधिकारी भी कम बाहूबली नहीं है. एक आदेश में आदेश दिया गया है कि यदि एम्.आर.पी.   बढानी है तो स्टीकर लगादे तथा अखबारों में विज्ञापन देवे लेकिन यह स्टिक्कर व विज्ञापन का खर्चा कौन वहन करेगा? कोन क्या, वही मजबूर व्यापारी जिसके वोटो की कोई वैल्यू नहीं है. गलती पूरी सरकारी लेकिन नुकसान भुगते व्यापारी क्योकि देश में निशुल्क सेवा करने का ठेका सिर्फ व्यापारी का ही है.

 6. पुरानी बिल बुक हुई रद्दी –  हालाकि कुछ व्यापारी पुरानी बिल बुक को काम में लेने की जोखिम ले रहे है लेकिन सरकार की तरफ से व्यापारी के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं. सरकार के इस नए क़ानून के अनुसार  व्यापारी बिल बुक वाली सारी स्टेशनरी रद्दी में बेच दे, जो भी रद्दी से मिले उसे सरकार द्वारा मिला हर्जाना समझले. तकलीफ यह है कि प्रिंटिंग प्रेसो में लम्बी लाइन है और बिल बुक या कुछ भी छपवाना संभव नहीं हो रहा है. ऐसी स्थिति व्यापारी क्या करे ?  नई बिल-बुको का खर्चा भी व्यापारी को ही भुगतना है, साथ-साथ बिल बुक या जरूरी स्टेशनरी छपने तक अपना व्यापार भी बंद रखना है.

 7. वकील, सीए या अन्य तरह के कर सलाहकारो के बिना कुछ भी संभव नहीं है – जीएसटी राज में व्यापारी सरकारी कागजी / कंप्यूटर की कार्यवाही को बिना वकील, सीए या अन्य तरह के कर सलाहकारो की मदद के कुछ नहीं कर सकता है. अत: व्यापारी के सिर पर भारी खर्चे का बोझ डाला गया है, जिसकी भरपाई भी जीएसटी से नहीं, व्यापारी अपने जेब से करनी है.

सीए के.सी.मूंदड़ा 

 

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