Friday, September 6, 2019

आधुनिक विज्ञान से विकास हो रहा हैं याँ विनाश। भारतीय पुरातन ज्ञान (भाग-56)-  

अब तक हमने आधुनिक विज्ञान की कार्यशैली व उसकी खोजो बाबत बात की हैं, इसमें कहाँ पर चूक हो रही हैं, विज्ञान द्वारा हमें सुख शांति ऐश्वर्य क्यों प्राप्त नहीं हो रहा हैं? इस को समझने हेतु हमें भारतीय पुरातन ज्ञान को समझना होगा।
ध्यात्म ज्ञान में हमारे व हमारे शरीर के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दी गई हैं, जिसे समझना होगा। अध्यात्म के अनुसार हम आत्मा हैं, शरीर नहीं। आत्मा न तो जन्म लेती हैं, और न ही उसकी मृत्यु होती हैं। जिसका जन्म होता हैं, उसकी मृत्यु अवश्य होगी। फिर जन्म-मरण किसका होता हैं?
दूसरा, आत्मा में सुख दुःख, राग द्वेष, ऊँच नीच, अपना पराया, भूख, निद्रा, थकान, चाहत, इच्छा, आकांक्षा, क्रोध, दया, भय, जरा, अहंकार आदि कुछ भी नहीं होता हैं। आत्मा न आग से जलती हैं, न पानी से गलती हैं, न हवा से उड़ती हैं। इसे किसी अस्त्र शस्त्र से खत्म नहीं किया जा सकता। आत्मा हमारे प्रत्येक कार्य का दृष्टा रूप हैं, परन्तु कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। भगवद् गीता में भी इस बाबत काफी उल्लेख मिलता हैं। विचारणीय बात यह हैं कि, हम वास्तव में आत्मा हैं, तो हमें उपरोक्त वर्णित बातों का अहसास क्यों होता हैं? हम जन्म, मरण, जरा, मृत्यु, सुख, दुःख आदि सभी विषयों में क्यों खोये हुए रहते हैं? हमें अपने आत्म रूप का भान क्यों नहीं होता हैं? सारा सांसारिक कर्म व्यक्ति अपने पेट और बाद में पेठ के लिए करता हैं। इसके लिए जीवन भर दुःख और संघर्ष झेलना पड़ता हैं। हम यदि आत्मा हैं, तो फिर यह सब समस्या क्यों?
इस दुनियाँ को भौतिक संसार कहा गया हैं। पञ्च महाभूतों से इस जगत का निर्माण होता हैं, इसलिए इसे भौतिक कहते हैं। हमारा शरीर भी पञ्च महाभूतों से बना हैं, इसलिए इसे भौतिक शरीर कहा जाता हैं। जिस तरह सारा संसार दृश्यमान हैं, उसी तरह हमारा शरीर भी दृश्यमान हैं। इसे स्थूल शरीर भी कहा जाता हैं। दिखाई देने वाला हर अंग स्थूल शरीर का हिस्सा हैं। जो दिखाई नहीं दे, वो सूक्ष्म शरीर कहा गया हैं। आज का विज्ञान इस बात को तरजीह दें याँ न दें, लेकिन हमारे पुरातन ज्ञान में इन सारी बातों पर गहरा शोध उपलब्ध हैं। सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, पञ्च प्राण, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, ये सारे अंग आते हैं।
जीवन प्रकृति से चलता हैं, पोषित होता हैं। प्रकृति तीनो गुणों (सत्त्व, रज और तम) से मिलकर बनती हैं। प्रकृति में यह तीनो गुण समान मात्रा में पाये जाते हैं। जब इन गुणों में असमानता आने लगती हैं, तब प्राकृतिक प्रकोप होने लगते हैं। प्रकृति माया, अविद्या व तम तीनो के योग से प्रधान प्रकृतिरुप विभाग को प्राप्त करती है। जो शुद्धसत्त्वगुणयुक्त हैं, उसको माया, जो मलिनसत्त्वगुणयुक्त हैं, उसको अविद्या, और जो मुख्यतया तमोगुणयुक्त हैं उसको तम कहा जाता हैं। इसलिए प्रकृति तम: प्रधान हैं।
सृष्टि से पूर्व एक मात्र अद्वितीय सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म था। इस ब्रह्म को सृष्टि के प्रारम्भ में, जीवन के परिपक्व हुए कर्मरूप निमित्त से, एक से अनेक (बहुरूप) होने की इच्छा हुई। इस इच्छा से माया में   क्षोभ उत्पन्न हुआ, जिससे पंचमहाभूत क्रमशः आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी उत्पन्न हुए। तब सभी अपञ्चिकृत थे, जिससे सूक्ष्म सृष्टि बनी। फिर ईश्वर इच्छा से इनका पंचीकरण हुआ और सारे भूत पंचीकृत हो गए, जिससे स्थूल सृष्टि बनी।
न सब के बाद हमारा जो स्वरूप बना वह देह यानि शरीर से जुड़ गया। इस देह के तीन रूप- स्थूलदेह, सूक्ष्मदेह व कारणदेह बताये गए हैं। मैं (आत्मा) तो इन तीनों देह का दृष्टा मात्र हैं।
पंचीकृत महाभूतों के पच्चीस तत्त्वों से मिलकर यह स्थूलदेह बनी हैं। नाम, जाति, वर्ण, सम्बन्ध, परिमाण, जन्म मरण आदि इस स्थूल देह के धर्म हैं।
सी प्रकार सूक्ष्म देह, जिसे लिंगदेह भी कहा जाता हैं, में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ, पांच प्राण, मन व बुद्धि कुल सत्रह तत्त्व (कई लोग चित्त व अहंकार को जोड़कर कुल उन्नीस तत्त्व मानते हैं) अपञ्चिकृत पंचमहाभूतो से बने हैं।
तीसरा कारण देह हैं। सुषुप्ति (गहरी निंद्रा) से उठे व्यक्ति को “मैं कुछ भी नहीं जानता” ऐसा ज्ञान होता हैं। यह ज्ञान अनुभवरूप नहीं हैं। यह सुषुप्तिकाल में अनुभव किये अज्ञान की स्मृतिमात्र हैं। इस स्मृति का विषय सुषुप्तिकाल का अज्ञान हैं। यह ज्ञान स्थूलसूक्ष्मदेह का हेतु हैं, इसी को कारण कहते हैं, यानि यह अज्ञान ही कारण शरीर कहलाता हैं। तत्त्वज्ञान से इस अज्ञान का दाह होता हैं, इसलिए इसे देह (शरीर) कहा हैं। यह अज्ञान गर्भमन्दिर के अंधकार की तरह ब्रह्म के आश्रित होकर, ब्रह्म को ही आवरण (ढकता) करता हैं। कारणदेह आप अज्ञान हैं।

क्या विज्ञान शरीर के इन गूढ़ रहस्यों बाबत कभी जान पायेगा?

शेष अगली कड़ी में—–

 

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